आज भी जीवित हैं भगवान परशुराम सूक्ष्म रूप में रहते हैं

Lord Parshuram

कौन थे भगवान परशुराम ?

परशुराम महर्षि जमदग्नि और रेणुका के सबसे छोटे पुत्र हैं इस समय वो महेंद्रगिरि नामक पर्वत पर आज भी अपने सुक्ष्म शरीर से तपस्या में लीन हैं. पूर्व काल में क्षत्रिय राजा बहुत अत्याचारी और तामसी प्रवर्ती के हो गये थे तब नारायण ने अपने अंश से परशुराम रूप में अवतार लिया और पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय राजाओं से रहित कर दिया.

किस उदेश्य से हुआ भगवान परशुराम का जन्म?

जब क्षत्रिय राजाओं की शक्ति बढ गई और उन्हें किसी बात का डर नहीं रहा, क्युँकि यदा कदा मानवों और पृथ्वी पर अत्याचार करने वाले दानव, देवताओं से डरे हुए थे और वो छुप कर रहते थे. क्षत्रिय समाज को पहले तो दानवों और देवताओं का डर था, लेकिन जब दानव शांत थे तो देवता भी शांत बैठ गये, तब पृथ्वी में क्षत्रिय समाज के राजा धीरे-धीरे निर्कुंश होते गये, प्रजा को भी तंग करने लगे.

इसके अतिरिक्त कई दानव भी क्षत्रिय कुल में जन्म लिये, जो ब्राह्मण नीति की बातों से उनका विरोध करता था उनको भी अपमानित करने लगे. ऐसे ही क्षत्रियों में एक राजा था सहस्त्रबाहु अर्जुन, जिसका उल्लेख पहले हो चुका है जिसने रावण को कैद कर लिया था। वो इतना निर्कुंश हो गया था कि

एक बार वो अपनी सैनिकों के साथ कहीं जा रहा था रास्ते में आश्रम देखा और उसने घमण्ड और अहंकार में बिना कारण न जाने क्युँ आश्रम को पानी से भर दिया. उसी समय एक बाहर से एक मुनि आये और उन्होने देखा सहस्त्रबाहू अपनी शक्ति का प्रयोग करके आश्रम में पानी भर दिया तो उन्होंने पूछा ये क्या कर रहे हो और क्युं कर रहे हो देखते नहीं ये मेरा आश्रम है. सहस्त्रबाहू बडी धृष्ठता के साथ ठहाके लगा कर हँसने लगा उसे पता भी नहीं था कि ये महर्षि वशिष्ठ हैं. महर्षि वशिष्ठ ने सहस्त्रबाहु अर्जुन को उसकी हरकत पर डपट दिया, तो वो अभिमान मे बोला आप दुबले पतले ब्राह्मण हो, नहीं तो मैं इस वक्त आपको दंड देता कि मुझसे इस तरह बात करने का नतीजा क्या हो सकता है. इस अर्जुन को दत्तात्रेय भगवान से वरदान प्राप्त था कि युद्द करते समय उसके एक हजार हाथ हो जाएंगे इसलिये उसका नाम सहस्त्रबाहु भी हो गया, उसकी इस मूर्खता पर महर्षी ने उसे कहा चिंता मत कर तुम और तुम्हारे जैसे घमण्डी लोग जो ब्राह्मणों को बाहुबल में कमजोर मानते हैं और उपहास या अपमान करते हैं उन सबको शीघ्र ऐसा ब्राह्मण मिलेगा जो अपने बाहुबल से ही तुम सब का अंत करेगा.  परशुराम वही बाहुबली ब्राह्मण थे.

भगवान परशुराम थे आज्ञाँकारी बालक

अपने पिता के सबसे बडे आज्ञाँकारी बालक, एक दिन उनके पिता जमदग्नि यज्ञ के लिये परशुराम की माता रेणुका से कहा, वो समिधा ले आए पास के वन से. लेकिन वो समय पर नहीं आई और यज्ञ का समय निकल गया. इस पर जमदग्नि ने रेणुका से कारण पूछा कि वो देर से क्युँ आई इस पर रेणुका ने झूठ बोल दिया कि उसे समिधा नहीं मिल पाई और वो काफी आगे निकल गई थी

जबकि रेणुका समिधा एकत्र करने के बाद वन में एक नदी के किनारे गंधर्वों को उनकी पत्नीयों के साथ तैराकी करते देखने में ही समय बीत गया था उसे समय का पता ही नहीं चला.

महर्षि जमदग्नि ने ध्यान से सब कुछ जान लिया तब उन्हें रेणुका के झूठ बोलने पर क्रोध आया उन्होंने अपने पुत्रों को बुलाया और एक-एक कर सबको कहा कि तुम्हारी माता ने झूठ बोला है अत: अपनी माता का सर काट डालो. बांकी पुत्रों में किसी ने आज्ञाँ नहीं मानी लेकिन जब परशुराम से कहा कि अपनी माता के साथ इन भाइयों का सर भी काट डालो तो उन्होंने बिना विलम्ब के अपनी माँ का और सभी भाइयों का सर काट दिया.

महर्षि प्रसन्न हो गये उन्होंने कहा पुत्र तुमने मेरी आज्ञाँ का पालन किया मैं इस बात से बहुत प्रसन्न हूँ तुम मुझसे वरदान माँगो. तब परशुराम जी ने कहा कि मेरी माँ और भाई पुन: जिवित हो जाए लेकिन उनको इस बात की याद न रहे कि उनका सर मैंने काटा था। महर्षी ने वैसा ही किया उनकी माता और भाई को पुन: जिवित कर दिया और उन्हें इस बात का पता भी नहीं चला.

तब परशुराम अपने माता पिता से आज्ञाँ ले कर तीर्थ की ओर चल पडे, उन्होंने तपस्या के बल पर मन की गति से किसी भी लोक में जाने की शक्ति प्राप्त की और तपस्या के बल पर कई पुण्य अर्जित कर लिये.

एक दिन उनके पिता जमदग्नि ध्यान मे बैठे थे, सहस्त्रबाहु अर्जुन ऊधर से अपनी सेना लेकर जा रहा था और फिर महर्षि के आश्रम में आया, महर्षि ने अर्जुन का सम्मान किया. अर्जुन ने महर्षि के आश्रम में दिव्य गौ कामधेनु को देखा तो उसने मुनि से कहा आप इस कामधेनु को मुझे दे दिजिये. इस पर मुनि ने असहमति जताई और कहा कि उन्हें कुछ काल तक ही इस गौ की सेवा का अवसर दिया गया है और यह गौ सप्तऋषियों की है, लेकिन अर्जुन बल पूर्वक कामधेनु को ले गया.

ईधर परशुराम आये और उन्हें बात पता चली तो वो अर्जुन के राजमहल की ओर दौडे और सहस्त्रबाहू अर्जुन को गाय वापस  करने के लिये कहा, लेकिन अभिमान में भरा राजा ने कहा गौ वापस नहीं दुंगा,और तुम कौन हो वापस जाओ. मैं राजा हूँ और राजा का प्रजा की प्रत्येक वस्तु पर अधिकार है इसलिये वापस जाओ नहीं तो बंदी बना कर कारागार में बंद कर दुंगा और सैनिकों से कहा बाहर का रास्ता दिखाओ इसे.

इस बात पर परशुराम जी ने क्रोध ने क्षण भर में ही उसके सैनिकों को काट-काट कर समाप्त कर डाला. सहस्त्रबाहु क्रोध से अपने एक हजार हाथ के साथ खडा हुआ और भीषण युद्ध छिड गया महल के बाहर एक तरफ परशुराम अकेले और दुसरी तरफ सहस्त्रबाहु उसके दस हजार पुत्र और हजारों की संख्या में सैनिक थे. जिसे भगवान दत्तात्रेय का आशिर्वाद प्राप्त था कि कोई क्षत्रिय राजा पृथ्वी में उसे ना हरा सकता है और ना उसे प्राक्रम में पीछे छोड सकता है आज वो अपने कई अस्त्र-शस्त्रों के होते अपने अभिमान और अहंकार के चलते परशुराम जी के सामने टिक न सका और परशुराम जी ने उसके महल के बाहर ही उसके एक हजार हाथ काट डाले और उसका अंत कर दिया.

उसके दस हजार पुत्रों में से कुछ ही बचे अन्य सब मारे गये. परशुराम अपनी गाय कामधेनु को वापस ले आये और पिताजी को दे दी. सब समाचार सुनाया. महर्षि जमदग्नि ने कहा कि पुत्र तुमने एक राजा की हत्या करके ठीक नहीं किया, इस पर परशुराम जी ने कहा  कि पिताजी उसे मारना मैं भी नहीं चाहता था किंतु शुरुवाद उसकी ओर से हुई और मुझे बंदी बनाने का आदेश उसने ही दिया था और एक मुनि की गाय को जबरन छिन लेना एक राजा का अधर्म है. सहस्त्रबाहु धर्म पारायण भी नहीं रहा था, वो अभिमानी और अहंकारी हो चुका था।

एक दिन अर्जुन के आठ या दस पुत्र जो जिवित बचे थे, उन्हें पता चला  परशुराम तीर्थ यात्रा पर गये हैं अत: उन्होंने अपने पिता सहस्त्रबाहु की मृत्यु का बदला लेने के लिये इसे उपयुक्त अवसर समझा. आश्रम में मुनि और उनकि पत्नी रेणुका के अलावा कोई नहीं था, मुनि ध्यान में बैठे थे तब सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने मुनि का सर काट दिया और रेणुका को भी पीट गये.

रेणुका ने अपने पुत्र परशुराम को पुकारा जो उस वक्त तपस्या में लीन थे. लेकिन माँ की आवाज उनके कानों तक पहुंच गई और मन की शक्ति से चलने वाले महर्षि क्षण भर में अपने घर पहुंचे और सब कुछ माँ के मुँह से सुना, तब क्रोध में अपने पिता की देह को अपने भाइयों को सौंप कर वे सहस्त्रबाहु के पुत्रों की ओर बडे वेग से आकाश मार्ग से उनके महल में पहुँच गये, उनको आया देख सब भय ग्रस्त हो गये और फिर परशुराम जी पर आक्रमण कर दिया. लेकिन कुछ ही समय में समूची सेना को परशुरामजी ने समाप्त कर दिया अंत में सहस्त्रबाहु के सभी पुत्रों को समाप्त कर डाला.

वापस आकर अपने पिता के मस्तक को जोडने के लिये अपने पिता के शरीर और मस्तक को लेकर कुरुक्षेत्र गये वहाँ यज्ञ किया, यज्ञ के लिये चार दिशाओं को क्रमश: ब्रह्मा और आचार्य नियुक्त किया. यज्ञ के अंत में महर्षी जमदग्नि के सर को पुन: जोड्कर मृतसंजीवनी विद्या के द्वारा जिवित कर दिया और अपने पिता जमदग्नि को सप्तऋषी  मंडल में सातवें सप्त ऋषि के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया तथा सहस्त्रबाहु के राज्य को ब्राह्मणों को दान में दे दिया.

सहस्त्रबाहु उस वक्त का सबसे शक्तिशालि क्षत्रिय राजा था अन्य क्षत्रिय राजाओं को परशुराम का प्राक्रम सहन नहीं हुआ, उन्हें एक ब्राह्मण के द्वारा एक सबसे शक्तिशाली क्षत्रिय राजा का युँ पराजित होना, सम्पूर्ण क्षत्रिय समाज का अपमान लगने लगा. अत: एक दिन योजनाबद्ध तरीके से सभी क्षत्रिय राजाओं ने मिलकर परशुराम पर आक्रमण कर दिया, लेकिन परशुराम के आगे सम्पूर्ण क्षत्रिय समाज के जितने भी घमण्डी वीर थे वो नहीं टिक सके और भाग खडे हुए. तब उनकी इस हरकत पर परशुराम को इतना क्रोध आया कि उन्होंने निश्चय किया और संकल्प लिया कि अब वो पृथ्वी पर एक भी क्षत्रिय राजा को जिवित नहीं छोडेंगे और उन्होंने सभी क्षत्रिय राजाओं का नामो निशान पृथ्वी से मिटा दिया और सम्पूर्ण पृथ्वी ब्राह्मणों को दान मे दे दी. स्वयं तप करने चले गये और हजारों वर्ष तक तप में लीन रहे.

इतने समय में ब्रह्मा जी की प्रेरणा से ब्राह्मणों ने पुन: क्षत्रियों को क्षिक्षित दीक्षित करके राजा बनाया, उनको जो भूमि परशुराम जी ने दान में मिली थी उसे क्षत्रिय राजाओं को दिया ताकि पृथ्वी पर सही ढंग से व्यवस्था चलती रहे. हजारों साल के बाद जब तपस्या से परशुराम ऊठे और देखा कि फिर से क्षत्रिय राजा बने हैं, बस इस बात पर उन्होंने फिर से एक बार और पृथ्वी को क्षत्रिय राजाओं से रहित कर दिया और फिर से  तप करने चले गये. फिर से वही कहाँनी हुई और परशुराम जी ने इस तरह ईक्कीस बार समूची पृथ्वी को क्षत्रिय राजाओं से विहिन कर दिया.

और इस बार ब्रह्मा जी ने महर्षि कश्यप को बुलाया और कहा कि परशुराम को सम्भालो, ईक्कीसवीं बार वो क्षत्रिय राजाओं का संहार कर चुके हैं अब बहुत हुआ. राजा के बिना राज्य नहीं छोडा जा सकता हैं प्रजा में समाज में धर्म का पालन राजा को ही करवाना होता है इसलिये राजा का होना आवश्यक है. आप उनके गुरु हैं और आपकी बात वो मानेगें. तब ब्रह्मदेव की आज्ञाँ मानकर महर्षि कश्यप आये और परशुराम जी ने उनकी चरण वंदना की और समूची पृथ्वी महर्षी कश्यप को दान में दे दी.

महर्षि कश्यप ने कहा मैं दान स्वीकार करता हूँ अब यह मेरे अधिकार में है अत: आज के बाद तुम मेरी इस धरती पर पैर भी नहीं रखोगे और ना ही कभी रात्रि में भी यहाँ विश्राम करोगे. परशुराम जी ने आज्ञाँ स्वीकार कर ली और आकाश मार्ग से समुद्र के निकट गये और अपने रहने के लिये स्थान देने को कहा.

तब समुद्र ने भयग्रस्त हो कर बिना देरी किये कहा महर्षि आप आप को जितनी भूमि चाहिये उसके लिये आप अपना फरसा मेरी तरफ समुद्र में फेंक दें  मैं आपको अपने गर्भगृह से उतनी धरती दे सकुंगा महर्षि ने कहा ठीक है परंतु जब मैं मांगू तो मेरा फरसा मुझे वापस भी दे देना और अपना फरसा समुद्र में फेंक दिया तब समुद्र ने अपने गर्भगृह से महेंद्रगिरि पर्वत को पृकट किया और महर्षि परशुराम उस पर्वत पर पुन: तपस्या में लीन हो गये और आज भी वो वहाँ अपने सूक्ष्म रूप में रहते हैं.

जब श्री राम ने शिव धनुष तोडा तो उसकी भयंकर ध्वनी से उनका ध्यान टुटा और वे क्षण भर में ही जनक के दरबार में पहुँचे. जनक जी उनकी पत्नी और सीता सबने प्रणाम किया और सीता जी को उनकी सखियां ले गई.

इसके बाद विश्वामित्र जी ने अभिनंदन किया राम लक्ष्मण ने प्रणाम किया, जो राजा बचे थे वो भय से ग्रस्त हो पिता सहित नाम बता कर प्रणाम कर खिसक लिये. इसी बीच परशुराम जी ने भीड-भाड का कारण पूछा जनक जी ने सब बताया तो गुस्सा कर गये कि धनुष तोड डाला. बोले जल्दी बताओ किसने तोडा नहीं तो मैं यहाँ जितनी भी राजा हैं सबको मार डालूंगा, बचे हुए दानव और देवता भेष बदल कर क्षत्रिय बनकर आये थे और जिन्हें जाने का मौका नहीं मिल पा रहा था उनकी हालत सबसे पतली थी क्युँकि प्रकट भी नहीं कर सकते थे कि वो कौन हैं. और अब भागने का मौका भी नहीं था।

कोई कुछ नहीं बोला तब श्री राम ने कहा मुनिवर जिसने धनुष तोडा वो आपका ही सेवक है आप बतलाइये क्या आज्ञाँ है. मुनि ने कहा धनुष तोड दिया और तुम कहते हो हमारा सेवक है अरे वो सेवक नहीं सहस्त्रबाहु जैसा मेरा घोर शत्रु है. तब लक्ष्मण ने कहा मुनिवर धनुष तोड दिया तो कौन सी बडी बात हो गयी, मेरे भ्राता ने इसे उठा के प्रत्यंचा चढाई ही थी कि यह पुराना धनुष टुट गया और इस बात पर मुनि क्रोधित हो गये और संवाद चलता रहा

फिर संवाद बढते-बढते परशुराम जी ने युद्ध की चुनौती दे डाली, तब श्री राम ने कहा कि हे मुनि आपसे हम युद्ध कैसे कर सकते हैं आप ब्राह्मण है आपकी प्रभुता ऐसी है कि आप स्वयं अपने भक्तों को अभय देने वाले हैं और हमारा वंश तो ब्राह्मणों की सेवा में ही रहा है आपने ही हमें अभय किया है अर्थात युद्ध का हमें कोई भय ही नहीं है पर जिससे युद्द करगें वो ही जब हमें अभय भी देने वाला है फिर युद्द किससे और कैसे हो सकता है. मीठे और अत्यंत गूढ वचनों को सुन मुनि को समझ आ गया ये साधारण राजकुमार नहीं हो सकते और अपना धनुष आगे करके बोले राम आप इस धनुष पर बाण चढा कर मेरे संदेह दूर किजिये.

श्री राम ने धनुष हाथ ले बाण चढाया तो समझ गये और परशुराम साक्षात भगवान के दर्शन पा कर धन्य हो ऊठे और तब श्री राम ने परशुराम जी से पूछा कि हे विप्रवर आप जानते हैं, ये अमोघ बाण है इसलिये आप ही बतलाए मैं इसे किस पर छोडुं किसे नष्ट करूँ. मुनि ने हाथ जोड्कर कहा राघव मैंने कई पुण्य लोक अर्जित किये हैं तपस्या के बल पर, और उसकी वजह से मुझे अहंकार और घमंड हो गया है इसी कारण से मैं आप को न पहचान सका, अत: आप मेरे सभी पुण्य नष्ट कर दिजिए इस बाण से. परशुराम ने क्षमा याचना करते हुए भगवान की सुंदर स्तुती की. राजा जनक ने महर्षि परशुराम को सीताजी के विवाह में सम्मिलित होने के लिये प्रार्थना की तब उन्होंने महर्षि कश्यप को दिये गये वचन की बात कही और पुन: तप को चले गये.

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